बाबा का वो आखिरी स्टेशन – एक दिल छू लेने वाली कहानी जो इंसानियत सिखा जाए
बाबा का वो आखिरी स्टेशन – एक दिल छू लेने वाली कहानी जो इंसानियत सिखा जाए
शाम की ठंडी हवा धीरे-धीरे चल रही थी। स्टेशन पर लोगों की भीड़ थी — कोई जल्दी में, कोई मुस्कुराते हुए, तो कोई बस खामोश खड़ा। हर चेहरा अपनी कहानी कह रहा था। उन्हीं चेहरों के बीच एक बूढ़ा आदमी बेंच पर बैठा था, हाथ में एक पुराना बैग और आंखों में गहराई तक भरी हुई थकान।
ट्रेन आने में अभी पंद्रह मिनट बाकी थे। पास में खड़ी एक लड़की ने पूछा —
“बाबा, कहां जाना है आपको?”
वो मुस्कुराए — “बस... आखिरी स्टेशन तक।”
लड़की ने हंसते हुए कहा, “वो तो सबका होता है बाबा, पर असली स्टेशन कौन-सा है?”
बाबा ने धीमे से कहा — “जिस जगह दिल को सुकून मिले, वही मेरा स्टेशन होगा।”
लड़की ने ध्यान से देखा — बाबा के कपड़े पुराने और पैरों में फटी हुई चप्पलें थीं, और आँखों में नमी जो शायद सालों से बसी हुई थी। उसने पानी की बोतल दी — “लीजिए बाबा, पानी पी लीजिए।”
बाबा ने बोतल लेते हुए कहा, “बेटी, तुमने मुझे पानी दिया है, वरना अब तो लोग नजरें भी नहीं मिलाते।
“कहां जा रहे हैं आप?”
“वहीं... जहां मेरी यादें हैं। मेरी पत्नी का गांव। पचास साल पहले छोड़ आया था, आज सोचा आखिरी बार देख लूं।”
लड़की चुप हो गई। बाबा की आवाज में कुछ ऐसा था जो दिल को छू गया।
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सफर की शुरुआत
ट्रेन आई लड़की ने बाबा का बैग उठाया और उन्हें सीट दिलाई। और खुद भी साथ बैठ गई।
“बाबा, आप अकेले रहते हैं?”
“हाँ बेटी। बेटा था, पर शहर चला गया। कहता है ‘बाबा, गांव में अब कुछ नहीं रखा।’ और मैं सोचता हूं, गांव में तो मेरा पूरा जीवन रखा है...”
ट्रेन चल पड़ी थी। खिड़की से हवा अंदर आ रही थी। बाबा अपनी यादों में खो गए थे —
“जब मैं जवान था, इस ट्रेन से हर सोमवार शहर काम करने जाता था। और हर शुक्रवार लौटते वक्त मेरी पत्नी स्टेशन पर इंतज़ार करती थी। हाथ में लोटा, आंखों में इंतजार।
उसकी मुस्कान ही मेरी ताकत थी।”
बाबा की आंखें भर आईं।
लड़की ने धीरे से कहा, “आप उनसे बहुत प्यार करते थे, है ना?”
“प्यार?... वो तो मेरी ज़िंदगी थी बेटी। जब वो गईं, मैं भी आधा रह गया।”
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बीच का स्टेशन — कुछ रिश्ते अनजान भी होते हैं
ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर रुकी। लड़की उतरकर दो कप चाय ले आई।
“बाबा, चाय लीजिए।”
“धन्यवाद बेटी... तुम्हारा नाम क्या है?”
“शिवानी।”
बाबा मुस्कुराए — “अच्छा नाम है। शिवानी मतलब होता है शिव की पत्नी अर्थात माँ दुर्गा, है ना?”
“हाँ बाबा।”
“शायद भगवान ने तुम्हें मेरी आखिरी यात्रा में भेजा है।”
शिवानी या ने बाबा का हाथ पकड़ लिया — “नहीं बाबा, भगवान ने मुझे भेजा है ताकि मैं आपकी कहानी सुन सकूं।”
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पुराने घर की गंध
तीन घंटे का सफर था। ट्रेन जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, बाबा की यादें और जीवंत हो रही थीं।
वो बोले — “हमारा घर स्टेशन के पास ही था। मिट्टी का, लेकिन उसमें खुशबू थी — सच्चे प्यार की। अब तो बस दीवारें होंगी और धूल।”
“कभी बेटे से बात नहीं होती?”
“नहीं बेटी। एक दिन कहा था — ‘बाबा, अब पुराने घर में कोई नहीं, उसे बेच दो।’ मैंने कहा — ‘जिस घर में तेरी माँ की हँसी गूँजी हो, उसे कैसे बेच दूँ?’
फिर उसने फोन करना ही छोड़ दिया।”
शिवानी के गले में कुछ अटक गया। उसने सोचा, लोग कितनी जल्दी अपने मूल को भूल जाते हैं।
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वो आखिरी स्टेशन
शाम तक ट्रेन उस छोटे से गांव के स्टेशन पर पहुंची।
बाबा खड़े हो गए — “आ गया बेटी, मेरा आखिरी स्टेशन।”
शिवानी ने कहा, “मैं भी उतरती हूं बाबा, थोड़ी देर साथ चलूंगी।”
स्टेशन छोटा था, पर हवा में मिट्टी की सच्ची खुशबू थी।
बाबा ने कांपते कदमों से पगडंडी पर चलना शुरू किया।
सामने वो घर था — टूटी दीवारें, बंद दरवाजा, और बरामदे में उगी हुई घास।
बाबा दरवाजे के पास जाकर बैठे — “देख बेटी, यहीं बैठा करता था मैं और तेरी माँ रोटी बेलती थी। शाम को हम दोनों दीया जलाते थे।”
उनकी आंखों से आंसू टपक पड़े।
शिवानी चुप थी। उसने बाबा का हाथ पकड़ा।
“बाबा, चलिए अंदर चलते हैं।”
“नहीं बेटी, यहीं ठीक हूँ... यहीं उसकी यादें हैं।”
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एक अनकहा विदा
शिवानी कुछ देर बाहर खड़ी रही। फिर अंदर से उसे लगा, बाबा कुछ कह रहे हैं —
“अब मैं आ गया हूँ... अब तू अकेली नहीं है।”
वो भागकर अंदर गई।
बाबा वहीँ दीवार से टिके मुस्कुरा रहे थे... लेकिन अब वो सांस नहीं ले रहे थे।
शिवानी की आँखों से आँसू झरने लगे।
उसने उनके माथे पर हाथ रखा — “बाबा, आप अपनी मंज़िल पा गए... सच में, यही था आपका आखिरी स्टेशन।”
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कुछ दिन समय बीतने क बाद शिवानी ने उस पुराने घर को साफ करवाया। और वो हर महीने वहां जाती, दीया जलाती, और बाबा की पसंदीदा नीम के पेड़ के नीचे बैठती।
लोग पूछते — “कौन हैं ये बूढ़े बाबा जिनका आप इतना ध्यान रखती हैं?”
वो मुस्कुराती — “वो मेरे अपने नहीं थे, पर उन्होंने मुझे सिखाया कि अपनापन खून से नहीं, एहसास से होता है।”
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कहानी का मुख्य उद्देश्य
कभी-कभी ज़िंदगी में हम ऐसे लोगों से मिलते हैं जो कुछ घंटे में हमें वो सिखा जाते हैं जो ज़िंदगी भर कोई नहीं सिखा पाता।
रिश्ते सिर्फ नाम के नहीं होते — कुछ रिश्ते बिना नाम के भी आत्मा को छू जाते हैं।
बाबा और शिवानी की मुलाकात यही साबित करती है —
“प्यार, अपनापन और इंसानियत कभी पुरानी नहीं होती।”








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