इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब मृत या असमर्थ सरकारी कर्मचारी के कानूनी वारिस भी कर सकेंगे
**इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब मृत या असमर्थ सरकारी कर्मचारी के कानूनी वारिस भी कर सकेंगे चिकित्सा प्रतिपूर्ति का दावा, नियम 16 की उदार व्याख्या से परिवारों को बड़ी राहत**
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा उपस्थिति) नियम, 2011 के नियम 16 की व्याख्या को व्यापक बनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि अब किसी मृत या असमर्थ सरकारी कर्मचारी के कानूनी वारिस भी चिकित्सा प्रतिपूर्ति (रिइम्बर्समेंट) का दावा कर सकेंगे।
न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने इस मामले में “रीड डाउन” के सिद्धांत को अपनाते हुए कहा कि नियम 16 को इस प्रकार पढ़ा जाना चाहिए कि यदि मूल लाभार्थी (बेनेफिशियरी) की मृत्यु हो जाती है या वह दावा करने में असमर्थ हो जाता है, तो उसके कानूनी वारिसों को यह अधिकार मिलना चाहिए।
अदालत ने अपने फैसले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि वर्तमान नियम ऐसी परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखता, जहां इलाज के दौरान ही लाभार्थी की मृत्यु हो जाए। ऐसे मामलों में परिवार को लाभ से वंचित करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि कानून के मूल उद्देश्य—जो कि एक कल्याणकारी दृष्टिकोण पर आधारित है—के भी विपरीत है।
पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि चूंकि यह एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी व्याख्या संकीर्ण नहीं बल्कि उदारतापूर्वक की जानी चाहिए, ताकि अधिक से अधिक प्रभावित लोगों को राहत मिल सके। अदालत ने यह भी जोड़ा कि “लाभार्थी” शब्द को व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए, ताकि ऐसी स्थिति में कानूनी वारिस भी इसके दायरे में आ सकें, जब कोई अन्य जीवित लाभार्थी उपलब्ध न हो और उपचाराधीन व्यक्ति की मृत्यु हो जाए या वह अक्षम हो जाए।
यह मामला एक ऐसे याचिकाकर्ता से जुड़ा था, जिसने अपने सेवानिवृत्त पिता के इलाज पर हुए खर्च की प्रतिपूर्ति की मांग की थी। उसके पिता गोरखपुर में डिप्टी रजिस्ट्रार (द्वितीय) के पद पर कार्यरत थे। हालांकि संबंधित विभाग ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता स्वयं लाभार्थी नहीं है, बल्कि केवल एक कानूनी वारिस है।
याचिकाकर्ता ने पहले राज्य लोक सेवा अधिकरण का रुख किया, जहां से पुनर्विचार का निर्देश मिला, लेकिन इसके बावजूद भी उसका दावा अस्वीकार कर दिया गया। अंततः मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां उसे न्याय मिला।
अदालत ने अपने निर्णय में यह भी पाया कि नियम 16 इस हद तक मनमाना है कि यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह समान परिस्थितियों में परिवार के सदस्यों के बीच भेदभाव करता है।
इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां किसी दावे को लेकर कोई विवाद नहीं है, वहां केवल औपचारिकता के तौर पर किसी व्यक्ति को उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है।
इस फैसले के साथ अदालत ने न केवल याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की, बल्कि भविष्य में ऐसे अनेक परिवारों के लिए रास्ता भी खोल दिया, जो अब तक तकनीकी कारणों से अपने वैध अधिकारों से वंचित रह जाते थे। यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के हितों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


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